घर के लडका मठा को तरसें
जमाना बदल गया है,किसी को अपनी फ़िकर नही जितनी कि दूसरों की रहती है,माता पिता ने बडे अरमानों के साथ शादी की सम्बन्ध स्थापित किया,लेकिन बेटाजी का ध्यान केवल चमक दमक के चक्कर में रांडबाजी में फ़ंस गया,रांड ने डोरे डाले और अपनी धाक जमा बैठी,एक घर में आकर बैठ गयी,दो लडके रांड के और दो पत्नी से चार का खर्चा,दो पत्नियां,जो रानी थीं वो तो बांदी बन गयी और जो बांदी थीं वे रानी बन बैठी,सुबह सुबह से ही हुकुम चलाना,और गप्पे मारना,कुछ इधर की और कुछ उधर की बातें करना,जो कुछ भी लडके के द्वारा कमा कर लाया जाना उसे अपने ऊपर और अपने लडकों पर वह रांड खर्च कर लेती,अच्छी चीजें खुद के लडकों को खिला देती बचा खुचा उन बेचारों को मिल पाता,पेट नही भर पाता तो वे पहले वाली के बच्चे पडौस के घरों की तरफ़ जाने लगे,कोई कुछ दे देता कोई कुछ समय निकलने लगा,दो पत्नी और चार बच्चे संभालना तो भारी पडता ही है,इधर खर्चे की मार उधर दिमागी परेशानी,क्या किया जाय,मजा की सजा है,शरीर भी कमजोर होता जा रहा था,दिमाग के अन्दर परेशानी आने लगी थी,खर्चो की मार पडने लगी थी,अक्सर अपनी थाली का भोजन कम ही स्वादिष्ट लगता है,दूसरों की थाली में घी अधिक दिखाई देता है,अपनी पत्नी और बच्चे तो अपने ही है,पराये बच्चे जब एक दम पापा कहने लगें और पराई स्त्री जरा ध्यान रखना चालू कर दे,तो घर वाली की आफ़त आ ही जाती है,अपने बच्चे दिमाग से कमजोर दिखाई देते है,लेकिन रांड के बच्चे इसलिये दिमाग से तेज दिखाई देते है,कि वे अपना काम निकालने के लिये कुछ भी सेवा कर सकते है,रात को रांड की सेज सजती है,पत्नी रात भर करवट बदल बदल कर निकालती है,मानसिक चिन्ता के चलते उसका शरीर भी सूखता जा रहा है,दिमाग भी चिढ चिढा होता जा रहा है,घर में कलह बढती जा रही है,एक दिन वही होता है,जो होना था,पत्नी अपने बच्चों को लेकर मायके चली जाती है,और पारिवारिक न्यायालय में मुकद्दमा ठोक देती है,कि उसके बच्चों और उसके लिये अदालत पति से खर्चा दिलवाये,पति देव को नोटिस आता है,अभी तक तो मानसिक तनाव था,अब शारीरिक तनाव भी बढ गया,पति देव भी सामने से जाकर जूझने लगे,वकील और अदालत की लडाई चालू हो गयी,इधर जिन बच्चों का भाग्य बनना था,उस जगह पर वे ननिहाल की रोटियों पर निर्भर है,ननिहाल भी कितने दिन खाना देती है,अदालती मामलों का खर्चा और जीवन निर्वाह के लिये साधन ननिहाल वाले भी तंग है,आखिर में पत्नी ने जाकर एक प्राइवेट कम्पनी में कपडे की सिलाई करने का काम कर लिया,इधर बच्चों ने अपने लिये ढाबे पर काम खोज लिया,पत्नी मुकद्दमा भी लडती बच्चों को खाना बनाना और उनका बाकी का काम भी करती,जीवन में कुछ सुधार आने लगा,उधर बाबूजी का बुरा हाल था,दिन रात मेहनत करते,अपने बचाव के लिये बकील दर बकील बदले जा रहे थे,इधर रांड के साथ रात को मीटिंग होती,कि पहले वाली पत्नी का क्या किया जाये,इन्सान के अन्दर भी जानवरी वृत्ति देखी जाती है,जब उसे कोई बचाव नही दिखाई देता है,तो वह हिंसा पर उतर आता है,वही उन बाबूजी ने किया,पता तो था ही कि पहले वाली पत्नी कहां पर किराये से रहती है,रात को उस रांड के एक दो साथियों को लेकर गये,और पत्नी का बच्चों के साथ काम तमाम करने की कोशिश की,भगवान का आशीर्वाद,सभी बच गये,पडौसियों ने उन सभी को लेकर पास के थाने में बंद करवा दिया,पुलिस को पूरा माजरा समझ में आ गया,उसने अदालत में हाजिर किया,और बाबूजी जेल में,इधर रांड को जो कमाई मिलती थी,उसमे एक दम कमी आगयी,उसके बच्चे भी सडक पर आगये,अब क्या किया जाये,उसकी तो आदत थी,फ़िर से किसी नये मुर्गे की तलास चालू हो गयी,और एक दिन जो भी घर का सामान था सभी ओने पोने दामों में ठिकाने लगाकर नये मुर्गे के साथ अपने बच्चों को लेकर चली गयी,बाबूजी जब जेल से बाहर आये,तो घर खाली मिला,रांड का पता चला कि वहा किसी अन्जानी जगह पर अपने बच्चे लेकर चली गयी है,पछतावे के लिये अब क्या किया जाये,एक ही बात समझ में आयी कि जो गल्ती की है,उसके लिये पत्नी से क्षमा मांगी जाये,पत्नी के पास गये,खूब रोये धोये लेकिन वह तो पसीज गयी,बच्चे जो अभी तक जमाने की हवा देख चुके थे,मां का दर्द देख चुके थे,उन्होने साफ़ मना कर दिया,कि पता नही कब किस जगह पर इस प्रकार का बाप ठिकाने लगा दे,अब दुनिया के किसी कौने में अपनी जगह नही दिखी तो आवारा बन कर निकल लिये,शरीर में दम नही रही थी,कोर्ट केश भी चल रहे थे,धीरे धीरे अचल सम्पत्ति भी ठिकाने लग गयी,कुछ बकील खा गये कुछ थानेदार और बिचौलिये खा गये,एक दिन उनका पता नही चला कि वे कहां गये,थाने से वारंट निकल गया,बकीलों ने मुकद्दमा हरवा दिया,अदालत ने फ़ैसला दे दिया कि पत्नी मुकद्दमा जीत गयी है,उसे हर्जा खर्चा दिया जाये,बाबूजी लापता है,पत्नी को इन्तजार है कि कभी तो वापस आयेंगे,साल दर साल निकल गये,बच्चे शादी शुदा हो गये,उन्होने अपने अपने प्रयास से अपना अपना घर बना लिया,पत्नी को कभी एक तो कभी दूसरा अपने साथ रखने लगा,जीवन चलने लगा.
उपरोक्त्त कारण को केवल एक ही बात से सुधारा जा सकता था,पत्नी के घर वाले किसी प्रकार से साम दाम दंड भेद से उस रांड को घर से निकाल देते तो बाबूजी का जीवन बच जाता.घाटा सिर्फ़ बाबूजी का ही हुआ,अपराध बाबूजी ने किया था,बाकी के तो साधन थे,अपने अपने स्थान पर चले गये.
Tags: राहु अष्टम शुक्र ज्य